फ़ैसला


Picture By Arushi Rawat


जाने कैसी आज़ादी है?

हर मंज़र बर्बादी है।

गुलामी की ज़ंजीरों से छूटकर,

अपनी ही आज़ादी में क़ैद हो गए।


लड़ते-लड़ते परायों से

कब ख़ुदअपनों से ही बैर हो गए?

मसले कई सारे हैं,

और मुद्दा कोई भी नहीं।


जवाब कैसे मिले भला?

सवाल सही कोई भी नहीं।

फ़ैसला आर पार का एक बार तो करना होगा,

हो अमन हरसू तो ख़ुद से भी लड़ना होगा।।

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